Sunday, August 7th, 2022

गुजरात की वो सरकार, जो देश में 51 साल पहले बहुमत नहीं होने पर पहली बार गिरी : Lokmat Daily

गुजरात की वो सरकार, जो देश में 51 साल पहले बहुमत नहीं होने पर पहली बार गिरी : Lokmat Daily

महाराष्ट्र में जो कुछ चल रहा है, वो पिछले कुछ सालों में कई बार देखा गया जबकि गठबंधन सरकारें बहुमत नहीं होने पर गिर गईं. 70 और 80 के दशकों में ये खूब हुआ लेकिन क्या आपको मालूम है कि देश में पहली बार किस राज्य में बहुमत नहीं होने से सरकार गिर गई थी. तब राज्य के मुख्यमंत्री पर सरकार बनाए रखने के लिए विधायकों के खरीद फरोख्त के आरोप लगे थे.

ये किस्सा गुजरात का है. तब सूबे के मुख्यमंत्री हितेंद्र कन्हैयालाल देसाई थे. वो मोरारजी देसाई के खास लोगों में गिने जाते थे. वो ऐसे शख्स भी थे, जो 90 के दशक से पहले सबसे ज्यादा बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने, एक-दो बार नहीं बल्कि तीन बार. उन्हीं की सरकार बाद में बहुमत साबित नहीं होने पाने की वजह से गिर गई.

पहली सरकार जो बहुमत नहीं होने पर गिरी
वो देश में पहली सरकार थी, जो बहुमत नहीं होने से गिरी थी. सितंबर 1965 में वह प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. दो साल बाद ही कांग्रेस उनकी अगुवाई में गुजरात चुनावों में उतरी. चुनाव में अखिल भारतीय कांग्रेस की जीत के बाद उन्होंने फिर 1967 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने का श्रेय हासिल किया. दूसरे टर्म में पहले दो साल तो उनके सही गुजरे लेकिन उसके बाद गुजरात में भी कांग्रेस में उठापटक और दोफाड़ का दौर शुरू हो गया.

मोरारजी देसाई के करीबी थे
1967 के बाद देश में जिस तरह की राजनीति चल रही थी. उससे लगने लगा था कि केंद्र में इंदिरा गांधी सिंडिकेट के मौजूदा तौरतरीकों से खुश नहीं हैं. तब गुजरात की सरकार में जो भी मुख्यमंत्री बनता था, वो मोरारजी देसाई का करीबी ही होता था या उनके प्रभाव में होता था.

तब वो इंदिरा के साथ जाने की बजाए सिंडिकेट के साथ रहे
1969 में जब कांग्रेस के राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी नीलम संजीव रेड्डी हार गए और इंदिरा गांधी द्वारा खड़े निर्दलीय प्रत्याशी वीवी गिरी ने जीत हासिल कर ली तो ये तय माना जाने लगा था कि कांग्रेस देशभर में टूटने की कगार पर है. नवंबर 1969 में जब इंदिरा गांधी को पार्टी ने से निकाला गया तो उन्होंने कांग्रेस आर के नाम से नई पार्टी बना ली.

गुजरात में सिंडिकेट की सरकार चलाते रहे
उसका असर गुजरात में भी पड़ा. यहां भी कांग्रेस दो हिस्सों में टूट गई. लेकिन हितेंद्र देसाई ने कांग्रेस सिंडिकेट के साथ बने रहने का फैसला किया और उनकी सरकार चलती रही. हालांकि उन पर ये आरोप लगने लगा कि वो जरूरी बहुमत बनाए रखने के लिए विधायकों की खरीद फरोख्त भी कर रहे है

1971 में जब इंदिरा भारी बहुमत से जीतीं तो सरकार अल्पमत में आ गई
खैर जो भी हो उनकी सरकार 1971 में तब तक चलती रही, जब तक कि इंदिरा गांधी भारी बहुमत से जीतकर केंद्र में नहीं आ गई. इसके बाद नए सिरे से देशभर में राज्य विधानसभाओं में दलबदल शुरू हो गई. बड़ी संख्या में कांग्रेस ओ के विधायक इंदिरा की कांग्रेस में पहुंचने लगे. गुजरात कोई अपवाद नहीं था. इंदिरा की जीत के बाद गुजरात में हिंतेंद कन्हैया लाल देसाई की अगुवाई वाली कांग्रेस ओ फिर टूटी . एक गुट पूरी तरह से इंदिरा की ओर चला गया.

हितेंद्र देसाई पर विधायकों की खऱीद फरोख्त का भी आऱोप लगा
हितेंद्र सरकार अल्पमत में आ गई. उनके पास जरूरी बहुमत नहीं था. हितेंद्र देसाई ने सरकार बचाने के लिए कोशिश की. तब 168 सीटों वाली गुजरात विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 85 सीटों का था लेकिन उनके पास इतने विधायक भी नहीं थे. तब उन्होंने विपक्षी दल स्वतंत्र पार्टी और कांग्रेस आर के कुछ विधायकों से संपर्क किया. कहा जाता है कि उन्होंने खरीद-फरोख्त की भी कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी.

तब राज्यपाल कानूनगो ने विधानसभा भंग कर दी
जब वो बहुमत नहीं साबित कर पाए तो राज्यपाल नित्यानंद कानूनगो ने राज्य विधानसभा भंग कर दी. ये पहला मौका था जबकि राष्ट्रपति चुनाव में गुजरात के विधायक हिस्सा ही नहीं ले पाए. हालांकि लोग अंदाज लगा रहे हैं कि कहीं ये स्थिति महाराष्ट्र में तो पैदा नहीं होगी.

तीन बार मुख्यमंत्री बने
तो हितेंद्र कन्हैयालाल देसाई के सिर पर ये सेहरा बंधा कि 1969 में इंदिरा गांधी द्वारा कांग्रेस में तोड़फोड़ करने के बाद उन्होंने गुजरात में कांग्रेस ओ यानि सिंडिकेट कांग्रेस का परचम बुलंद रखा वहीं ये भी वो 1965 से लेकर 1971 के बीच तीन बार मुख्यमंत्री बने. उन्हीं के कार्यकाल में 1969 में गुजरात बुरी तरह सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलसा था.

1971 में बहुमत नहीं हासिल करने के बाद जब हिंतेंंद्र देसाई की सरकार गिरी तो फिर वो कभी राजनीति की मुख्य धारा में नहीं लौट सके. हालांकि उनका निधन 1993 में हुआ. उन्होंने 78 साल की उम्र पाई.

Tags: Gujarat, Gujarat government

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